डॉ. राजेंद्र प्रसाद सादगी पसंद, दयालु एवं निर्मल स्वभाव के व्यक्ति थे : त्रिपुरारी बक्सी

◆61 वीं पुण्यतिथि पर याद किये गये डॉ राजेन्द्र प्रसाद, राष्ट्रीय कायस्थवृन्द के सदस्यों ने दी श्रद्धांजलि

 

GIRIDIH (गिरिडीह)। कायस्थों की अग्रणी संस्था राष्ट्रीय कायस्थवृन्द ने देश के प्रथम राष्ट्रपति, कायस्थ्य कुल गौरव, देश रत्न डॉ राजेन्द्र प्रसाद को उनकी 61 वीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित किया।

स्थानीय कर्बला रोड जेपी नगर स्थित राष्ट्रीय कायस्थवृन्द के जिला कार्यालय में इस मौके पर एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। चित्रांश भवन में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रीय उपाध्यक्ष त्रिपुरारी प्रसाद बक्सी ने एवं संचालन जिला सचिव संजीव सिन्हा ‘सज्ज्न’ ने किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ उपस्थित लोगों द्वारा डॉ राजेन्द्र प्रसाद की तस्वीर पर माल्यार्पण कर एवं श्रद्धा सुमन अर्पित कर किया गया।

 

इस दौरान उपस्थित लोगों ने उनके जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद सादगी पसंद, दयालु एवं निर्मल स्वभाव के व्यक्ति थे।

 

 

वक्ताओं ने कहा कि राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को हुआ था। उनके पिता का नाम महादेव सहाय एवं माता का नाम कमलेश्वरी देवी था। पिता फारसी और संस्कृत भाषाओं के विद्वान तो माता धार्मिक महिला थीं। वे उन भारतीय नेताओं में से थे जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। महात्मा गांधी ने उन्हें अपने सहयोगी के रूप में चुना था और साबरमती आश्रम की तर्ज पर सदाकत आश्रम की एक नई प्रयोगशाला का दायित्व भी सौंपा था।

 

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद चाहे धर्म हो, वेदांत हो, साहित्य हो या संस्कृति, शिक्षा हो या इतिहास, राजनीति, भाषा, वे हर स्तर पर अपने विचार व्यक्त करते थे। उनकी स्वाभाविक सरलता के कारण वे अपने ज्ञान-वैभव का प्रभाव कभी प्रतिष्ठित नहीं करते थे। ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ के अपने सिद्धांत को अपनाने वाले डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपनी वाणी में हमेशा ही अमृत बनाए रखते थे।

 

कहा कि आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को भारत को गणतंत्र राष्ट्र का दर्जा मिलने के साथ ही राजेंद्र प्रसाद देश के प्रथम राष्ट्रपति बने। वर्ष 1957 में वे दोबारा राष्ट्रपति चुने गए। इस तरह वे भारत के एकमात्र राष्ट्रपति थे, जिन्होंने लगातार दो बार राष्ट्रपति पद प्राप्त किया था। उन्हें सन् 1962 में अपने राजनैतिक और सामाजिक योगदान के लिए भारत के सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से भी नवाजा गया। बाद में उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया और अपना शेष जीवन पटना के निकट एक आश्रम में बिताया, जहां 28 फरवरी, 1963 को बीमारी के कारण उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली।

 

कार्यक्रम में त्रिपुरारी बक्सी, राजेश कुमार, शिवेन्द्र सिन्हा, संजीव रंजन सिन्हा, विकास सिन्हा, कुमार राकेश, राजेश कुमार सिन्हा ‘राजू’, दीपक कुमार सिन्हा, मुकेश कुमार सिन्हा, अभय कुमार, रंजीत सिन्हा आदि मौजूद थे।

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