- कैलाश चंद्र
आधुनिक युग में मानवता अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ रही है। वैज्ञानिक नवाचार, आर्थिक विस्तार और राजनीतिक प्रभाव उन ऊंचाइयों तक पहुंच चुके हैं, जिन्हें मानव इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया। राष्ट्र अधिक शक्तिशाली हो गए हैं, तकनीक अधिक बुद्धिमान हो गई है और लोग पहले से कहीं अधिक जुड़े हुए हैं। किंतु इस शक्ति और क्षमता के बढ़ते विस्तार के साथ साथ चरित्र, नैतिकता और मानवीय संवेदनशीलता में एक चिंताजनक गिरावट भी दिखाई दे रही है। आज दुनिया एक विरोधाभासी मोड़ पर खड़ी है, जहां भौतिक प्रगति तेजी से आगे बढ़ रही है, वहीं समाज की नैतिक और आचारिक नींव कमजोर पड़ती जा रही है।
सत्ता अपने आप में न तो अच्छी होती है, न बुरी। उसका मूल्य पूरी तरह उस व्यक्ति के चरित्र पर निर्भर करता है जिसके हाथ में वह होती है। जब सत्ता का संचालन बुद्धिमत्ता, सत्यनिष्ठा और करुणा से होता है, तब वह प्रगति, स्थिरता और सामंजस्य का निर्माण करती है, लेकिन जब वह स्वार्थ, लालच और अहंकार के अधीन हो जाती है तो विनाशकारी बन जाती है। सदगुणों से रहित अधिकार समाज का निर्माण नहीं करता, बल्कि उसे भीतर से तोड़ देता है। यही हमारे समय का मौन संकट है।
कोई व्यक्ति कितना भी प्रभावशाली, धनी, शिक्षित या सम्मानित क्यों न बन जाए, यदि उसका नैतिक और सामाजिक चरित्र भ्रष्ट है, तो वह समाज के लिए गंभीर खतरा बन जाता है। इतिहास ने बार बार यह सिद्ध किया है कि सत्ता और धन का दुरुपयोग राष्ट्रों की नींव को कमजोर कर देता है। जब प्रभावशाली पदों पर बैठे लोग सामूहिक हित के बजाय निजी लाभ को प्राथमिकता देने लगें तब भ्रष्टाचार एक रोग की तरह फैलता है। संस्थाएं कमजोर पड़ जाती हैं, विश्वास समाप्त हो जाता है और लोगों का न्याय तथा निष्पक्षता पर भरोसा डगमगाने लगता है।
मनोरंजन उद्योग पर्दे पर ऐसे अतिरंजित नायकों को महिमामंडित करता है जो दुनिया को बचाते हैं, जबकि वास्तविक दुनिया में होने वाले अनेक कार्य विभाजन, संघर्ष और शोषण को बढ़ावा देते हैं। जो राष्ट्र लोकतंत्र और समानता के मूल्यों का गर्व से गुणगान करते हैं, वे कभी कभी युद्धों, संसाधनों के दोहन और आर्थिक प्रभुत्व में भी भागीदार बनते हैं। शब्दों और कर्मों के बीच की खाई इतनी चौड़ी हो गई है कि उसे अब अनदेखा नहीं किया जा सकता। मानवता की चिंता का भव्य प्रदर्शन उसके भीतर छिपे पाखंड को अब नहीं ढक सकता।
दुनिया जिस गति से मूल्यहीन जीवन की ओर बढ़ रही है, वह चिंताजनक है। नैतिकता को धीरे धीरे विकल्प की तरह देखा जाने लगा है और सफलता को जिम्मेदारी से अलग कर दिया गया है। यह नैतिक संकट अब एक वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है। ऐसे समय में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है, यह एक ऐसी सभ्यता है जिसने हजारों वर्षों से संतुलन, करुणा, सत्य और सामूहिक कल्याण पर बल दिया है। इसकी सांस्कृतिक चेतना आत्मसंयम, कर्तव्य और सामंजस्य के सिद्धांतों में निहित है। वसुधैव कुटुंबकम का विचार, धर्मपूर्ण आचरण पर बल और आंतरिक चरित्र पर केंद्रित दृष्टि भारतीय चिंतन का मूल रहे हैं। ऐसे समय में, जब नैतिक भ्रम तेजी से फैल रहा है, ये शाश्वत मूल्य मार्गदर्शक प्रकाश बन सकते हैं।
आज भारत विश्व को नैतिक संतुलन और मानवीय संवेदनशीलता की दिशा दिखाने की क्षमता में है, किंतु यह जिम्मेदारी घर से ही शुरू होती है। भारत के लोगों को पहले उन शक्तियों से स्वयं को बचाना होगा जो दुनिया भर के समाजों को कमजोर कर रही हैं, अनियंत्रित महत्वाकांक्षा, अंधा भौतिकवाद और चरित्र का क्षरण। यह आत्ममंथन का समय है। हर व्यक्ति को कुछ कठिन किंतु आवश्यक प्रश्न स्वयं से पूछने होंगे। क्या हमारी शक्ति हमारे चरित्र द्वारा संचालित है? क्या हमारी शिक्षा हमें बुद्धिमान और जिम्मेदार बनाती है या सिर्फ कुशल और महत्वाकांक्षी? क्या हम अपनी व्यक्तिगत सफलता को ईमानदारी और सामाजिक योगदान से जोड़ते हैं? क्या हम व्यक्तिगत लाभ से ऊपर राष्ट्रीय और सामाजिक हित को रखते हैं?
यही प्रश्न सच्चे देशभक्ति के भाव को परिभाषित करते हैं। ध्यान रहे, राष्ट्र से प्रेम शब्दों, उत्सवों या नारों तक सीमित नहीं होता। किसी देश की वास्तविक रक्षा उसकी सीमाओं पर नहीं होती। वह हर दिन लोगों द्वारा किए गए चुनावों में दिखाई देती है। जब कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार के बजाय ईमानदारी चुनता है, सुविधा के बजाय जिम्मेदारी चुनता है और छल के बजाय सत्य को अपनाता है, तब राष्ट्र की रक्षा होती है।
जब एक व्यक्ति अपने चरित्र की रक्षा करता है, तो वह अपने राष्ट्र की रक्षा करता है। ईमानदारी का हर कार्य समाज को मजबूत करता है। दया का हर कार्य एकता का निर्माण करता है। अंतरात्मा से लिया गया हर निर्णय देश की नैतिक रीढ़ को सुदृढ़ बनाता है और जब पूरा समाज अपनी नैतिक नींव की रक्षा करने का संकल्प लेता है, तब उस स्थिति में वह अंधकार से जूझती दुनिया के लिए एक प्रकाशस्तंभ बन जाता है।
भारत में मूल्यों और मानवता की ज्योति को जीवित रखने की क्षमता है। इसकी आध्यात्मिक परंपराएं, नैतिक जीवन पर जोर और सामूहिक कल्याण में विश्वास उस दुनिया को आशा दे सकते हैं जो धीरे धीरे अपनी दिशा खोती जा रही है। पर यह आशा तभी जीवित रहेगी जब व्यक्ति अपने कर्मों और अपने चरित्र की जिम्मेदारी स्वयं उठाएगा।
यह समय है सुविधा पर चरित्र को, आडंबर पर मूल्यों को और स्वार्थी महत्वाकांक्षा पर जिम्मेदारी को चुनने का। यदि भारत अपने नैतिक संकल्प में दृढ़ बना रहता है, तब वह न सिर्फ अपने समाज में संतुलन स्थापित कर सकता है, बल्कि पूरी दुनिया में भी संतुलन बहाल करने में सहायक बन सकता है। ऐसा करते हुए वह मानवता को यह स्मरण कराएगा कि सच्ची शक्ति प्रभुत्व में नहीं, करुणा में है; धन में नहीं, बुद्धि में है; यह सत्ता में नहीं, धर्ममय आचरण और जीवन में है।
(लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और स्तंभकार हैं।)

